आखिर कौन बनता है ये चुनावी स्याही : जानिए क्या है नुकसान और फायदे


भारत में लोकसभा चुनाव के लिए मतदान 19 अप्रैल को शुरू हुआ था जो की सात चरणों में हो रहा है. अब तक इसके छह चरण पूरे हो चुके हैं साथ ही  पूरा देश बैनर, पोस्टर और रैलियों जैसे चुनावी रंगों से भर गया है लेकिन  एक महत्वपूर्ण परंपरा जो जस की तस बनी हुई है वह है वोट देने से पहले मतदाताओं की उंगलियों पर नीली स्याही का उपयोग। यह परंपरा भारतीय चुनावों का एक खास हिस्सा है और हमेशा इसका पालन किया जाता है  सभी वोटर्स  वोट देने तो जा ही रहे है, 

लेकिन क्या अपने कभी ये सोचा है की आखिर ओट देने के बाद वहां बैठे अधिकारी आपके हाथ में ये नीली कलर की स्याही क्यों लगता है।  आखिर इसमें कौन सी स्याही प्रयोग की जाती है और इसमें ऐसी क्या खास बात होती है की ये स्याही इतने दिनों तक हमारे अंगुलियों  से नहीं हटती ही नहीं।  तो आइये जानते है ऐसी क्या खास बात है इस स्याही में ? 

Election Ink

दरअसल ये इंक जब आप ओट देने जाते है तो ये इंक आपको लगा दी जाती है दरअसल ये ओटर के लिए एक indication की तरह काम करती है ये यह दर्शाती है की आप ओट दे चुके है जिससे ऑफिसर्स को भी पता चल जायेगा की आप ओट डाल चुके हो दुबारा ओट न डाल पाओ।  इस स्याही का प्रयोग पहले पल्स पोलियो प्रोग्राम में होता था।  जिन बच्चो को टिका लग जाता था।  उन्हें इसी स्याही से मार्क  लगाया जाता था।

जानिए कैसे और कहाँ बनती है ये स्याही -

इस स्याही को भारत में 2 जगहों पर बनाया जाता है।  भारत में 2 कंपनी इस स्याही को बनाती है। 

1 . ) रायडू लैबोरेट्री ( हैदराबाद ) 

2 . ) मैसूर पेंट एंड वार्निश लिमिटेड कंपनी 

इंडिया में ही नहीं बल्कि इंडिया के अलावां 90 देशों में इस स्याही का प्रयोग किया जाता है।  भारत में मैसूर पेंट एंड वार्निश लिमिटेड द्वारा बनायीं जाने वाली स्याही का प्रयोग किया जाता है और दुनिया के कई देशों में इसी कंपनी से ही स्याही का निर्यात किया जाता है।   

इसका फार्मूला तो सीक्रेट है लेकिन कंपनी का कहना है की इसमें कई तरह के रसायनो का प्रयोग किया  जाता है इसमें लगभग 10 – 18 % सिल्वर नाइट्रेट का प्रयोग किया जाता है।  और सूर्य की रौशनी पड़ते ही इसका रंग और भी पक्का  जाता है इसके निर्माताओं के मुताबिक सिल्वर नाइट्रेट की इसमें अहम् भूमिका  होती है जबकि इसमें दूसरे रसायनो का भी मिश्रण  होता है।  एक बार लगने के बाद यह  तब तक निकल कर नहीं आता है जब स्किन की कोशिकाएं पुरानी नहीं हो जाती है और ये निकले लगती है।  लेकिन अगर ये एक सेकंड के लिए भी त्वचा पर  है तो ये अपना प्रभाव छोड़ देगी।

आखिर कब से प्रयोग हो रही ये स्याही -

पिछले 70 सालों से अधिक समय से चुनावों में इस स्याही का बख़ूबी इस्तेमाल हो रहा है। इसको भारतीय चुनावों  में शामिल करने का श्रेय देश के पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन को जाता है और अभी तक चुनाव आयोग इसके दूसरे विकल्प को नहीं तलाश पाया है।  भारतीय चुनावों में इसका प्रयोग 1960  के दशक से ही  हो रहा है। 2019 के चुनावो में  भारतीय चुनाव आयोग ने 26 लाख बोतल स्याही का आर्डर दिया था।  हर  एक बोतल में लगभग 10 मिली स्याही होती है और एक बोतल की कीमत 127 रूपये होती है।  

तर्जनी में ही क्यों लगायी जाती है ये स्याही -

ये स्याही मतदाताओं के बाएं हाथ के तर्जनी अंगुली में लगायी जाती है लेकिन क्या हो अगर किसी के पास तर्जनी  ही न हो तो उसके बाएं हाथ के किसी भी उंगली पर स्याही लगायी जा सकती है। किसी के पास बाएं हाथ न होने की अवस्था में उसके दाएं हाथ में स्याही लगायी जा सकती है। और दोनों हाथ न होने की स्थिति में पैरों के अँगुलियों में स्याही लगायी जा सकती है।


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